आत्मनिर्भरता

Posted On फ़रवरी 6, 2008

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‘ कुछ  न  करुं  मैं  और  कोई  सब  कर  दे
लाके  इष्ट  वस्तु  बस  मेरे  आगे  धर  दे,
ऐसा  क्लीब  का  कापुरुष  सबका  सहेगा  शाप,
भोग  क्या  करेगा।  जो  न  अर्जन  करेगा  आप।
             इस  संसार  में  मनुष्य  को  दूसरों  के  सम्पर्क  में  आना  जाना  पड़ता  है।दूसरे  मनुष्य  तो  हमारी  सहायता  करते  हैं  और  कभी- कभी  सहायता  तो  क्या  उल्टा  हमारे  प्रतिकूल  हो  जाते  हैं। जो  व्यक्ति  हमारे  अनुकूल  है  वह  भी  हर  समय  हमारी  सहायता  नहीं  कर  सकता। ऐसी  स्थिती  में  मनुष्य  को  अपना  सहारा आप  बनने  की  ज़रुरत  है। जीवन  में  आपत्तियों के  आने  पर  आत्मनिर्भरता  से  ही  काम  चल  सकता  है। स्वावलम्बन  का  यह  अर्थ  कदापि  नहीं  कि  मनुष्य  प्रत्येक  काम  में  अपनी  मनमर्ज़ी  करे। जिन  व्यक्तियों  में  आत्मनिर्भरता  का  अभाव  है, वे  न  तो  अपना  उद्वार  कर  सकते  हैं  और  न  ही  देश  और  जाति  के  उत्थान  मेंअपना  सहयोग  प्रदान  कर  सकते  हैं।  कहा  भी  है-
    जो   सबका   मुंह   ताका   करते,   मिली   उन्हें   मंझधार   है।
    बनो   स्वावलम्बी   जीवन   में,   तो  निश्चित  उद्वार   है।              

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