कुसंगति

Posted On जून 4, 2007

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सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य को दूसरों के साथ किसी-न किसी रुप में सम्पर्क स्थापित करना पड़ता है। अच्छे लोगों की संगति जीवन को उत्थान की ओर ले जाती है तो बुरी संगति पतन का द्वार खोल देती है। संगति के प्रभाव से कोई नहीं बच सकता।हम जैसी संगति करते हैं, वैसे ही हमारा आचरण बन जाता है।
तुलसीदास ने सत्संगति का महत्व स्पष्ट करते हुए कहा है-
बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिना सुलभ न सोई।
बुरे लोगों से बचने की प्रेरणा देते हुए सूरदास जी ने भी कहा है-
छाड़िः मन हरि, विमुखन को संग,   जाके संग कुबुद्धि उपजत है परत भजन में भंग।
                                                                  धन्यवाद।

3 Responses to “कुसंगति”

  1. divyabh

    सच कहा है…कुसंगति ही अधर्म के मार्ग को प्रशस्त करती है…।

  2. समीर लाल

    अच्छा रहा आज का पाठ भी. हमेशा पढ़कर जाते हैं बस यही मान कर आप लिखते चलें.

  3. संजय पटेल

    एक दम ठीक फ़रमाया आपने.मैं अपने अनुभव से कहूं तो संग से जीवन मे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढता है.मैं पढा़ई में कोई करामात नहीं कर पाया लेकिन संग ने जीवन को ऐसी बातों से रंग दिया कि वे हर क्षेत्र में क़ामयाबी दिलवाती गईं.संग का जलवा देखिये जहां एक ओर आज के अभिभावक बच्चों के बाहर जाने पर आशंकाओं से घिरे नज़र आते हैं , मेरे माता पिता को कभी चिंता नहीं करनी पड़ी कि लड़का बाहर गया है तो कहीं बिगड़ न जाए..इस विश्वास पर क़ायम इसी लिये रह सका कि संग कभी बुरा नहीं किया ..बल्कि ऐसे लोगों का साथ किया जो मुझसे उम्र और इल्म में बड़े थे.वे पथ-प्रदर्शक बने,सखा बने, सीख बने और बने मेरे आदर्श.ऐसे उदाहरण भी देखने को मिले कि कुछ मित्र या परिजन थे तो बहुत अच्छे लेकिन कुसंग ने उनके पूरे जीवन और परिवार का सत्यानाश कर दिया.क़ाबिल थे,पैसे वाले थे लेकिन कुसंग से घर और कारोबार की,सफ़लता,समृध्दि,श्री,संपदा और सामाजिक छवि चली गई….सुसंग से बने जीवन महान…कुसंग को गले की फ़ांसी जान.

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