दैवी प्रकोप- भूकम्प

Posted On मई 18, 2007

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Comments Dropped 4 responses

प्रकृति उस ईश्वर की रचना होने के कारण अजेय है। मनुष्य आदिकाल से ही प्रकृति की शक्तियों के साथ संघर्ष करता आ रहा है। उसने अपनी बुद्धि, साहस एवं शक्ति के बल पर प्रकृति के अनेक रहस्यों का उदघाटन करने में सफलता प्राप्त की है, लेकिन इस प्रकृति की शक्तियों पर पूर्ण अधिकार करने की सामर्थ्य मनुष्य में नहीं। प्रकृति अनेक रुपों में हमारे सामने आती है। यह कभी अपना सुख़दायी रुप दिखाती है तो कभी ऐसा कठोर रुप धारण करती है कि मनुष्य इसके सामने विवश और असहाय बन जाता है। आंधी, तूफान, अकाल, अनावृष्टि, अतिवृष्टि तथा भूकम्प ऐसे ही दैवी प्रकोप हैं। धरती का कोई भी अंग ऐसा नहीं बचा है जहां कभी न कभी भूकम्प के झटके ना आये हो। भूकम्प के हल्के झटकों से तो विशेष हानि नहीं होती, लेकिन जब कभी जोर के झटके आते हैं तो वे प्रलयकारी दृश्य उपस्थित कर देते हैं। आज का युग विज्ञान का युग कहलाता है, पर विज्ञान दैवी प्रकोप के सामने विवश है। ईश्वर की इच्छा के आगे सभी विवश हैं। मनुष्य को कभी भी अपनी शक्ति और बुद्धि का घमंड नहीं करना चाहिये। उसे हमेशा प्रकृति तथा ईश्वर की शक्ति के आगे नतमस्तक रहना चाहिये। ईश्वर की कृपा ही मानव जाति को ऐसे प्रकोपों से बचा सकती है।
                                     धन्यवाद।
                

4 Responses to “दैवी प्रकोप- भूकम्प”

  1. divyabh

    परमात्मा ने प्रकृति का निर्माण मानव के बौद्धिक विकास और सामर्थ्यवान होने के लिए किया था मगर हमने इसका उपयोग मात्र अपनी तृष्णा बचाने के लिए किया…

  2. समीर लाल

    पोस्ट पैनल की साईज जरा बढ़ा दें तो मजा आये. वैसे यह श्रृंगार बढ़िया है, बधाई!!

  3. राजलेख की हिंदी पत्रिका

    आपकी यह रचना मुझे बहुत पसंद आयी

  4. paramjitbali

    अच्छे विचार प्रेषित किए हैं ।बधाई। कृपया फोंटं साइज बड़ा करं।

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