दहेज प्रथाः भयंकर सामाजिक अपराध

Posted On मई 14, 2007

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दहेज एक ऐसी राक्षसी कुप्रथा है जिसने भारतीय जनता को संतृप्त, भयभीत, दुर्बल और रोगी बना छोड़ा है। दहेज के कारण सुन्दर से सुन्दर और योग्य से योग्य पुत्री का पिता भयभीत और चिन्तित है तथा जिसके कारण हर भरतीय का सिर लज्जा और ग्लानि से झुक जाता है।दहेज के अभाव में पिता को मन मारकर अपनी लक्ष्मी सरीखी़ बेटी को किसी बूढ़े,रोगी,अपंग, और पहले से ही विवाहित तथा कई सन्तान के पिता के हाथ सौंप देना पड़ता है। मूक गाय की तरह बेटी को यह सामाजिक अनाचार चुपचाप सहन करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त केवल एक ही विकल्प उसके पास बच रहता है अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दे। परिणाम ये हुआ कि अनेक निर्धन माता-पिता बेटी के जन्म लेते ही क्रूरता पू्र्वक बेटी का गला दबाकर हत्या करने लगे। इस संबंध में कठोर कानून सरकार को बनाने पड़े फ़िर भी बालिका वध को नहीं रोका जा सका। दहेज के इस दानव ने समाज में जाने कितनी फूल सी नारियों को असमय ही क्रूरतापूर्वक निगल लिया हे। कितनी लड़कियां आज निर्दयता पूर्वक दहेज के लोभी सास-ससुर द्वारा जलाई जा रहीं हैं,ऐसी स्थिती में भी पति कहलाने वाले कायर युवकों की लज्जा फूंफकार कर नहीं उठती; उनकी मनुष्यता विचरित नहीं हो पाती। जब तक सारा समाज ही दहेज दानव के विरुद्ध उठ खड़ा नहीं होता तथा दहेज लेने वालों के मुंह काले करके  सारे नगर में घूमाने की प्रथा सामान्य नहीं हो जाती, तब तक दहेज का दानव अपने दुष्ट खेल ही खेलता रहेगा।
धन्यवाद।

4 Responses to “दहेज प्रथाः भयंकर सामाजिक अपराध”

  1. मनीष

    सही कहा आपने ! अहर आज के युवा इसके खिलाफ कमर कस लें तो इस कुप्रथा से निजात पाया जा सकता है ।

  2. Gyandutt Pandey

    बन्धु, दहेज के मूल में है लोभ. लोभ क्रूर होता है पर कायर भी होता है. उसे टेकल करने के लिये साहस चाहिये – चाहे नारी में चाहे वर में.
    पर जो दहेज से त्रस्त हैं, वे मौका पाने पर दहेज से मस्त भी होना चाहते हैं. यहां जो पीड़ित है वही पीड़क भी बन जाता है. अत: इसे समाज की सड़न के रूप में लेना चाहिये. लड़की का बाप बेचारा नहीं है. वही जब लड़के का बाप बनता है तो दांत दिखाता है.

  3. समीर लाल

    सत्य वचन. मैं आपसे सहमत हूँ.

  4. अनूप शुक्ल

    सत्य वचन! जब तक लड़का-लड़की नहीं चाहेंगे दहेज समाप्त नहीं हो सकता!

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