Posted On अप्रैल 26, 2007

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कल्पना का जगत अत्यन्त ही मधुर है। वहां किसी प्रकार की कोई बाधा-रुकावट नहीं है। आवश्यक नहीं कि जीवन के जिस मधुर स्वपन को बडे़ यत्न से मैंने संजोया है उसी को आपने या किसी अन्य ने उसी प्रकार संजोया हो क्योंकि जीवन-स्वपन का स्वरुप एक निजी प्रश्न है। यह नहीं कहा जा सकता कि अमुक का जीवन स्वरुप सुंदर, रम्य, मधुर नहीं है और अमुक का जीवन सफ़ल और सुंदर है क्योंकि यह अपनी-अपनी रुचि का प्रश्न है।जीवन का हर एक दिन एक त्यौहार है और हर रात बसंती रजनी। जिंदगी को कल्पना के जगत में अगर जिया जाए तब जिंदगी का हर दिन एक त्यौहार लगेगा और हर रात एक बसंती रात जो बिना किसी रुकावट-बाधा के मधुर होगी और मजे़दार होगी। ध्येय अथवा लक्ष्य के बिना जीवन निर्रथक है। ध्येय चुनते समय स्वार्थ पुरुषार्थ का समन्वय रखना चाहिये। ईश्वर ने मानव को चिन्तन-मनन कि अदभुत् शकि्त दी है।ध्येयहीन जीवन ऐसा ही है जैसे कोई नाविक समुद्र के बिना पतवार और जड़ों के नाव को भाग्य के भरोसे छोढ़ दे।
 धन्यवाद
 

2 Responses to “”

  1. divyabh

    बहुत गहरे में कहा है…निंद तो खुल गई…।उद्गार भी है और राह भी…मैने पहली बार पढ़ा है इसे पर अच्छा लगा…

  2. feketefene

    *****
    ****
    ***
    **
    *
    http://feketefene.wordpress.com/2007/04/26/ignite-rocks/
    GOOD MUSIC! Check it out!

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