प्रेम

Posted On मार्च 5, 2007

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प्रेम    
 आकाश में,जल में,हवा में,विपिन में क्या बाग में,
  घर में जल में, ह्रदय में,गांव में,तरू में तथैव तड़ाग में,
   है कौन सी वह शक्ति,जो है रहती एक सी सदा,
  जो है जुदा करके मिलाती,मिलाकर करती जुदा? वह प्रेम है।

3 Responses to “प्रेम”

  1. DR PRABHAT TANDON

    हां यह निस्वार्थ प्रेम ही है जो हम सब को एक कडी मे बांधे है.
    होली की बहुत-२ शुभकामनायें और हिन्दी चिट्ठाकारी मे आपका बहुत-२ स्वागत है.

  2. सागर चन्द नाहर

    बिल्कुल यही प्रेम है, जिसमें सब कोई अपना सर्वस्व लुटा रहा है, बिना किसी फल की आशा में।
    हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है, कृपया नारद जी को अपने चिट्ठे की सूचना दे देवें ताकि और लोग भी आपके चिट्ठे को पढ़ सकें।
    नारद जी का पता है:
    http://www.narad.akshargram.com

    हाँ एक कोशिश करें कि हिन्दी-अंग्रेजी के लिये अलग अलग चिट्ठा बना लेवें।

  3. रिपुदमन पचौरी

    aap ki panktiyaan prerit lagtee hain…. PREM par likhi iss kavitaa se….

    “kaun see vo shakti hai, jo sare bhuvan mein vyaapt hai
    bhramand bhi puraa nahin jiss ke liye paryaapt hai …..
    …………………
    dhyaan hee jiss kaa mitaataa aap akaa sab shok hai ..
    vah prem hai, vah prem hai, vah prem hai

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