दालें
दालों से मिलने वाले पौष्टिक तत्व दालों के बनानेविटाम की विधि पर अधिक निर्भर करते है। दालें बनाने से पहले आठ घंटे भिगोयें। दालें छिलकों सहित लें। छिलकों वाली दाल बिना छिलकों वाली दाल से अधिक लाभदायक है।सखी अवस्था में दालों में दालों में विटामिन ‘सी’ नहीं होता लेकिन भीगने के बाद विटामिन ‘सी’ अधिक मात्रा में प्रकट हो जाता है। दालों को पकाने का सबसे आम तरीका पानी में उबालने का है। दाल से बनी चीज़े पापड़, मंगोड़ी, दाल-मोठ आदि रोगियों के रोग ठीक होने पर देने से शक्तिप्रद खाद्य है। मिठाईयाँ नहीं देनी चाहिये।
क्या आप जानते हैं ?
प्रकृति एवं स्वभाव से आप शाकाहारी हैं।
आहार का हमारी अपनी प्रवृत्ति पर वैसा ही असर पड़ेगा जैसा हम उसे ग्रहण करेंगे।
शाकाहारी भोजन माँसाहारी भोजन की तुलना में पौष्टिक एवं स्वास्थ्य के लिये ज़्यादा उपयुक्त है। ये विचार न सिर्फ पूर्व बल्कि पश्चिमी सभ्यता के वैज्ञानिकों, दार्शनिकों एवं चिकित्सकों के हैं।
शाकाहारी भोजन पचाने में शरीर के पाचन तंत्र पर उतना ज़ोर नहीं पड़ता, न ही उतना समय लगता है जितना कि माँस को पचाने में।
शाकाहार से लाभ
शाकाहार जीवन को दीर्धायु, शुद्ध, बलवान एवं स्वस्थ बनाता है।
शाकाहारी भोजन मन में दया, समानता, आपसी स्नेह और सहनशीलता उत्पन्न करता है।
शारीरिक नैतिक और आध्यात्मिकसभी दृष्टि से शाकाहारी भोजन मानव के लिये सर्वोत्तम है।
शाकाहारी अधिक उत्पादक हैं और कम से कम अपव्ययी है।
दुर्बल रोगी फलों अथवा सब्जियों के रसों का उपयोग कर स्वास्थय लाभ प्राप्त कर सकता है।
मनुष्य के दाँतों और दाँतों की रचना शाकाहारी भोजन के लिये की है।
फलाहार विटामिन की कमी के कारण होने वाले रोगों से बचाव व छुटकारा देता है।
माँसाहार से हानियाँ
माँसाहार से पाचन क्रिया में विखंडन एवं दुर्गन्ध पैदा होती है जिससे अपच हो जाता है और पसीने में बदबू आती है।
माँस सेवन मनुष्य को क्रोधी, असहिष्णु, चिड़चिड़ा और आलसी बनाता है।
माँस सेवन कई प्रकार की बीमारियों जैसे मोटापा,रक्तचाप, कैंसर, गठिया,मधुमेह पित्त सम्बन्धी एवं ह्रदय के रोगों को आमंत्रित करता है।
माँस में विद्धमान कीटाणु एवं वसा शरीर की प्रतिरोधक शक्ति घटाता है।
माँस एवं अंडों में कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है।
माँसाहार तामसी प्रवृति पैदा करता है जिससे कि समाज में आपसी मनमुटाव, निर्दयता जैसी बुराईयाँ पैदा होती है।
गन्ना के गुण
इसे ईख, साँठा भी कहते हैं। नित्य गन्ने का रस पीने और घूमते रहने से स्वाे्थ्य अच्छा रहता है। एक गिलास गन्ने का रस नित्य दो बार पीने से सूखी खाँसी में लाभ होता है। छाती की घबराहट जाती रहती है। ईख चूसते रहने से पथरी टुकढ़े-टुकढ़े होकर निकल जाती है। मन्द ज्वर में गन्ने का रस एक गिलास नित्य दो बार पीना लाभदायक है। गनएना नेत्रों के लिये हितकर है। जौ का सत्तू खाकर ऊपर से गन्ने का रस पीयें। एक सप्ताह में पीलिया ठीक हो जाएगा। ईख भोजन पचाता है,कब्ज़ दूर करता है,शक्तिदाता है। शरीर मोटा करता है।पेट की गर्मीको दूर करता है।
ख़सख़स के गुण
ख़सख़स की खीर खाने से शक्ति बढ़ती है।दो चम्मच ख़सख़स रात को पानी में भिगो दें, उसे पीसकर प्रातः स्वादानुसार मिश्री मिलाकर पानी में घोलकर लस्सी बनाकर पीने से गर्मी में मस्तिष्क ठंडा रहता है। ख़शख़श का शर्बत भी लाभदायक है। गर्मी के मौसम में होने वाले चर्म रोग इसका शर्बत पीते रहने से ठीक हो जाते हैं।दो चम्मच खसख़स में पानी डाल कर पीसकर चौथआई कप दही में मिलाकर नित्य दो बार छः घंटे के अन्तर से खाने से पेचिश, मरोढ़ और दस्त ठीक हो जाते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बातें
अधिक क्रोध व चिन्ता से बाल अधिक सफेद होते हैं। इसलिये चिन्ता न करें। स्वस्थ बालों के लिये मानसिक संतुलन बनाए रक्खें।
छोटी माता, चेचक होने पर भोजन में दूध, अंगूर, अनार, मौसमी आदि मीठे रसदार फल लें।
घाव, फोड़े होने पर नमक कम लें।
गर्मी के मौसम में पैदा होने वाली सब्जियाँ, फल अधिक खाने से पथरी निकल जाती है।
वृक्क के रोगों में पान लाभदायक है।
पानी के गुण
जिनका शरीर मोटा हो गया है, और जो चाहते हैं कि अधिक मोटा न हो, उन्हें सदा गुनगुना पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिये। गर्म भोजन,खीरा,खरबूजा, ककढ़ी खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिये।भोजन के एक घंटे बाद पानी पीने से आमाश्य को शक्ति मिलती है।उच्च रक्तदाब, ज्वर, लू लगना, पेशाब की बीमारियाँ, ह्रदय की धड़कन, कब्ज़, पेट में जलन आदि रोगों में अधिकाधिक पानी पीना चाहिये। जिन्हें कब्ज़ रहे उन्हें भोजन के साथ घूँट-धूँट पानी पीते जाना चाहिये।प्रातः उठते ही एक गिलास पानी पीएँ। खाना न पचे, बदहज़मी हो जाए तो एक दिन केवल पानी ही पीकर रहें।अन्य कुछ न खाएँ।
छाछ या मठ्ठा शरीर से विजातीय तत्वों को बाहर निकालकर नव- जीवन प्रदान करता है। शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न करता है। छाछ में घी नहीं होना चाहिये। गाय के दूध से बनी छआछ श्रेष्ठ होती है। भोजन के अन्त में छाछ, रात्रि के मध्य दूध और रात्रि के अन्त में पानी पीने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। गाय की छाछ में नमक मिलाकर पीने से कृमि मर जाते हैं। मोटापा छाछ पीने से कम होता है। छोटे बच्चों को नित्य छाछ पिलाने से दाँत निकलने में कष्ट नहीं होता। अपच के लिये छाछ एक औषधि है।
April 14, 2008
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